ज़िन्दगी : 'एक सवाल'
कभी सवाल तो कभी जवाब लगती है..
हे! ज़िन्दगी तू ही बता तू मेरी क्या लगती है।
कभी 'द्वंद' तो कभी पुराना 'महताब' लगती है..
हे !ज़िन्दगी क्यों हमेशा एक 'अधूरा' -सा ख़्वाब लगती है।
कभी उड़ती 'पतंग' तो कभी नदी की नाव लगती है..
कभी बेरंग 'शहर' तो कभी खुशियों का 'गाँव' लगती है!
हे! ज़िन्दगी तू ही बता 'तू' मेरी क्या लगती है।
कभी सरस 'मधुवन' तो कभी निर्जन 'थार' लगती है..
हे ! ज़िन्दगी तू ही बता तू क्यों एक 'उल्फ़त' की 'बहार' लगती है।
हे! ज़िन्दगी तू ही बता तू मेरी क्या लगती है।
कभी 'द्वंद' तो कभी पुराना 'महताब' लगती है..
हे !ज़िन्दगी क्यों हमेशा एक 'अधूरा' -सा ख़्वाब लगती है।
कभी उड़ती 'पतंग' तो कभी नदी की नाव लगती है..
कभी बेरंग 'शहर' तो कभी खुशियों का 'गाँव' लगती है!
हे! ज़िन्दगी तू ही बता 'तू' मेरी क्या लगती है।
कभी सरस 'मधुवन' तो कभी निर्जन 'थार' लगती है..
हे ! ज़िन्दगी तू ही बता तू क्यों एक 'उल्फ़त' की 'बहार' लगती है।
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